Saturday, August 22, 2009

ज़िंदगी भी


ज़िंदगी भी अजब तमाशा है
हर घड़ी कुछ नया-नया सा है 

दिल ठहरने की सोचता भी नहीं
पाँव ही कुछ थका-थका सा है

मुन्तज़िर है किसी के दामन का
एक आंसू रुका-रुका सा है

जब से बादाकशी से तौबा की
अपना साक़ी ख़फ़ा-ख़फ़ा सा है

कुछ सयानों की देख कर फितरत 
एक बच्चा डरा-डरा सा है 


Monday, August 10, 2009

प्यार की

 
प्यार की; दोस्ती की बात करें 
आइये ज़िंदगी की बात करें

आँधियों में जो टिमटिमाती है
आज उस रौशनी की बात करें

बारिशों में नहा के घर लौटें
तरबतर सी ख़ुशी की बात करें

दर्द  को  ख़ूब  परेशान  करें
खिलखिला कर हँसी की बात करें

ये फ़रिश्ते कहाँ से समझेंगे
इनसे क्या आदमी की बात करें 


Wednesday, July 15, 2009

सबको मालूम थे

सबको मालूम थे हमसे भी भुलाए न गए
वे कथानक जो कभी तुमको सुनाये न गए 

गीत लिखते रहे जीवन में अंधेरों के खिलाफ़
और दो-चार दिये तुमसे जलाए न गए
 
दूर से ही सुनीं वेदों की ऋचाएं अक्सर
यज्ञ में तो कभी शम्बूक बुलाए न गए 

यूकेलिप्टस के दरख्तों में न छाया न नमी
बरगद-ओ-नीम कभी तुमसे लगाए न गए

इसी बस्ती में सुदामा भी किशन भी हैं नदीम
ये अलग बात है मिलने कभी आये न गए

Saturday, July 11, 2009

मंज़िलों से परे

मंज़िलों से परे गुज़रती है 
जिंदगी कब, कहाँ ठहरती है

यूं तो हर ओर धूप बिखरी है 
मेरे आँगन में कम उतरती है 

एक गुड्डा मिला था कचरे में
एक गुड़िया दुलार करती है 

आँधियों की कहानियां सुन कर
एक चिड़िया हवा से डरती है 

मुट्ठियाँ बांधने से क्या होगा
रेत झरनी है, रेत झरती है

Tuesday, June 30, 2009

मैं बतलाऊं

मैं बतलाऊं कैसा बन जा
बिलकुल अपने जैसा बन जा

सरदी में सूरज बन कर जल
जेठ तपे तो छाया बन जा

तनहा क़तरे की हस्ती क्या
सबसे मिल कर दरिया बन जा

सदियों से गूंगी है मूरत
इसे छेड़ दे, नग़मा बन जा

समझदार बन कर क्या होगा
चल नदीम फिर बच्चा बन जा

Wednesday, June 24, 2009

ग़ज़ल संग्रह का लोकार्पण

अलीगढ़, २१ जून,२००९ 
डा. अमर ज्योति 'नदीम' के प्रथम ग़ज़ल संग्रह 'आँखों में कल का सपना है'
का लोकार्पण पद्मभूषण गोपाल दास नीरज ने होटल 'मेलरोज़ इन' में किया.
कार्यक्रम की अध्यक्षता जयपुर से पधारे प्रख्यात शायर लोकेश कुमार सिंह'साहिल'
ने की.
कार्यक्रम का शुभारम्भ गीतकार बनज कुमार 'बनज' की सरस्वती वन्दना से हुआ.
श्रीमती अर्चना'मीता', प्रो.आलोक शर्मा और पुश्किन द्वारा अतिथियों का माल्यार्पण
द्वारा अभिनन्दन किया गया. विमोचन करते हुए पद्मभूषण गोपाल दास नीरज ने कहा
कि नदीम की ग़ज़लों में ग़ज़ल के सभी तत्त्व विद्यमान हैं और वे एक समर्थ शायर व 
गज़लकार हैं. इस अवसर पर नीरज ने ग़ज़ल की विकास यात्रा पर प्रकाश डालते हुए
ग़ज़ल को आधुनिक काव्य की एक लोकप्रिय विधा बताया और अपने गीत व ग़ज़ल
भी सुनाये. 
नदीम ने अपने लोकार्पित संग्रह से कुछ गज़लें पढीं और मनमोहन ने संग्रह की एक 
ग़ज़ल की संगीतमय प्रस्तुति की. नदीम की ग़ज़ल 'हम जिये सारे खुदाओं,देवताओं
के बगैर' को ख़ूब सराहना मिली.
जयपुर से पधारे ख्यातिप्राप्त गज़लकार व समीक्षक अखिलेश तिवारी, अरुणाचल प्रदेश
से पधारे डा.मधुसूदन शर्मा, व हिन्दी साहित्य के प्रोफेसर प्रेमकुमार ने संग्रह के बारे
में अपने-अपने समीक्षात्मक आलेख भी पढ़े. प्रेम पहाड़पुरी व सुरेन्द्र सुकुमार ने
नदीम के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डाला. 
समारोह के उत्तरार्द्ध में एiक कवि-गोष्ठी आयोजित की गई
जिसमें अशोक अंजुम(अलीगढ़),बनज कुमार बनज(जयपुर), अखिलेश तिवारी(जयपुर),
महेश चन्द्र गुप्त 'खलिश'(दिल्ली), राजकुमार 'राज'(दिल्ली) और लोकेश कुमार
सिंह 'साहिल'(जयपुर) ने कविता पाठ किया.समारोह के अंत में संग्रह के
प्रकाशक 'अयन प्रकाशन' के स्वामी भूपाल सूद ने धन्यवाद ज्ञापन 
किया. प्रख्यात साहित्यकार, साहित्यिक पत्रिका 'अभिनव प्रसंगवश'
के संपादक एवं स्थानीय धर्मसमाज महाविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष
प्रोफेसर वेदप्रकाश अमिताभ ने कार्यक्रम का संचालन किया.

Saturday, June 6, 2009

कितने ही पौधे

कितने ही पौधे छाँव में बरगद की मर गये
इलज़ाम मगर धूप के, सूरज के सर गये

सदियों  से जिन्हें  आपने  बाँधा  है  हदों में
क्या होगा किसी रोज़ जो हद से गुज़र गये

इक  बावला जो चीख़ के  सच बोलने लगा
सारे  शरीफ़  लोग अचानक  ही  डर  गये

पतवार जिनको सौंप के हम सब थे मुतमइन
वे  लोग  नाव  चलने  से  पहले  उतर गये

इक  अजनबी  मकान किराये का था नदीम
और हम समझ रहे थे के हम अपने घर गये