Sunday, September 7, 2008

बदली के छाने से

बदली के छाने से, मोरों के गाने से;

दहशत सी होती है, सावन के आने से।


गोबर भी बीनें तो सूखा कब मिलता है,

आँखें ही जलती हैं चूल्हा सुलगाने से।


खेतों में काम नहीं, घर में भी दाम नहीं,

शायद कुछ बात बने,शहर भाग जाने से।


सारे फुटपाथों पर पानी भर जाता है;

रात भर भटकते हैं बिस्तर छिन जाने से।


गावों से, शहरों से, घर से फ़ुटपाथों से,

हम तो निष्कासित हैं हर किसी ठिकाने से।

Thursday, September 4, 2008

किसे फ़ुरसत

किसे फ़ुरसत कि फ़ुरक़त में सितारों को गिना जाये;

ज़रा फ़ुटपाथ पर सोए हज़ारों को गिना जाये।


महकते गेसुओं के पेच-ओ-ख़म गिनने से क्या होगा;

सड़क पर घूमते बेरोज़गारो को गिना जाये।


वो मज़हब हो, के सूबा हो, बहाना नफ़रतों का है;

वतन में दिन-ब-दिन उठती दिवारों को गिना जाये।


हमें मालूम है ‘बिलियॉनियर` हैं मुल्क में कितने;

चलो अब भूखे-प्यासे कामगारों को गिना जाये।


कोई कहता है ‘गाँधी का वतन’ तो जी में आता है,

कि गाँधी की अहिंसा के शिकारों को गिना जाये।

Wednesday, September 3, 2008

रात भर

रात भर सोने नहीं देते, जगाते हैं हमें;
कुछ पुराने ख़्वाब अक्सर याद आते हैं हमें.

नाख़ुदा बैठे हैं सब कश्ती का लंगर डाल कर,
और तूफ़ानों की बातों से डराते हैं हमें.

दाल-रोटी के सवालों का नहीं देते जवाब,
आक़बत की याद जो हर पल दिलाते हैं हमें.

डोरियाँ बारीक हैं इतनी कि दिखतीं भी नहीं;
और कठपुतलों के कठपुतले नचाते हैं हमें.

वक़्त देगा इस हिमाक़त का जवाब इनको नदीम;
राह के पत्थर भी अब चलना सिखाते हैं हमें.

Monday, September 1, 2008

हमारी शक्ल

हमारी शक्ल भी टी.वी पे आ जाती तो अच्छा था.
इधर भी बाढ़ इक चक्कर लगा जाती तो अच्छा था.

गिराते हम भी लाखों की मदद उड़ते जहाज़ों से;
और अपनी जेब में भी कुछ समा जाती तो अच्छा था.

इधर तो मुद्दतों से बाढ़ और भूकंप गायब हैं;
यहाँ भी ये घटा कुछ दिन को छा जाती तो अच्छा था.


हमारी भी तरफ़ नज़र-ऐ-करम करती कभी कुदरत;
पकी फ़सलों पे ओले ही गिरा जाती तो अच्छा था.

बदलते वक़्त के क़दमों की ये ख़ामोश सी आहट,

तुम्हें भी वक़्त रहते ही जगा जाती तो अच्छा था.

बचपन से अलबेले

बचपन से अलबेले हो तुम;
शायद तभी अकेले हो तुम.

खोखो, कंचे, और कबड्डी,
कभी सड़क पर खेले हो तुम?

इस जर्मन शेफर्ड सरीखे
पाले कई झमेले हो तुम.

टी.वी. पर फुटबाल देख कर,
मन ही मन में 'पेले' हो तुम .

रोमानी पीड़ा के शायर,
कब कितना दुख झेले हो तुम?

Saturday, August 30, 2008

बाग़ों में

बाग़ों में प्लॉट कट गए, अमराइयाँ कहाँ!

पूरा बरस ही जेठ है, पुरवाइयाँ कहाँ!


उस डबडबाई आँख मे उतरे तो खो गए;

सारे समंदरों में वो गहराइयाँ कहाँ!


सरगम का, सुर का, राग का, चरचा न कीजिये;

‘डी जे’ की धूमधाम है; शहनाइयाँ कहाँ!


क़ुरबानियों में कौन सी शोहरत बची है अब?

और बेवफ़ाइयों में भी रुसवाइयाँ कहाँ!


कमरे से एक बार तो बाहर निकल नदीम;

तनहा दिलों की भीड़ है, तनहाइयाँ कहाँ!

Saturday, August 23, 2008

घर में

घर में बैठे रहे अकेले, गलियों को वीरान किया;
अपना दर्द छुपाए रक्खा; तो किस पर एहसान किया?

दुखियारों से मिल कर दुख से लड़ते तो कुछ बात भी थी;
कॉकरोच सा जीवन जीकर, कहते हो बलिदान किया!

दैर-ओ-हरम वालों का पेशा फ़िक्र-ए-आक़बत है तो हो;
हमने तो चूल्हे को ख़ुदा और रोटी को ईमान किया।

किशन-कन्हैया गुटका खा कर जूते पॉलिश करता है;
पर तुमने मन्दिर में जाकर माखन-मिसरी दान किया।

मज़हब,ज़ात,मुकद्दर,मंदिर-मस्जिद,जप-तप,हज,तीरथ,
दानाओं ने नादानों की उलझन का सामान किया।

कड़ी धूप थी; रस्ते में कुछ सायेदार दरख़्त मिले;
साथ नहीं चल पाए फिर भी कुछ तो सफ़र आसान किया।