बदली के छाने से, मोरों के गाने से;
दहशत सी होती है, सावन के आने से।
गोबर भी बीनें तो सूखा कब मिलता है,
आँखें ही जलती हैं चूल्हा सुलगाने से।
खेतों में काम नहीं, घर में भी दाम नहीं,
शायद कुछ बात बने,शहर भाग जाने से।
सारे फुटपाथों पर पानी भर जाता है;
रात भर भटकते हैं बिस्तर छिन जाने से।
गावों से, शहरों से, घर से फ़ुटपाथों से,
हम तो निष्कासित हैं हर किसी ठिकाने से।