Sunday, April 18, 2010
बंजरों में बहार
Saturday, February 20, 2010
लम्बी-चौड़ी
Tuesday, February 9, 2010
अपनी धरती
अपनी धरती के साथ रहता हूं
उसके सब धूप-ताप सहता हूं
और कभी जेठ जैसा दहता हूं
सब परिन्दों के साथ उड़ता हूं
सारी नदियों के साथ बहता हूं
जागता हूं सुबह को सूरज सा
शाम को खण्डहर सा ढहता हूं
इसमें तुम भी हो और ज़माना भी
यूं तो मैं अपनी बात कहता हूं
Wednesday, January 27, 2010
बीन का
साँस का ज़िन्दगी से रिश्ता हो
ऐसी बस्ती बसाइये जिसमें
सबका सबकी ख़ुशी से रिश्ता हो
अपनी गिनती है देवताओं में
किस लिये आदमी से रिश्ता हो
ये दुमहले गिरें तो अपना भी
धूप से, रौशनी से रिश्ता हो
अब तो राजा हैं द्वारिका के किशन
किस लिये बाँसुरी से रिश्ता हो
Monday, January 11, 2010
Wednesday, January 6, 2010
रास्ता ही
रास्ता ही भूल जाओ एक दिन
आओ मेरे घर भी आओ एक दिन
बासी रोटी से ज़रा आगे बढ़ो
उसको टॉफ़ी भी खिलाओ एक दिन
क्या मिलेगा ऐसे गुमसुम बैठ कर,
साथ मेरे गुनगुनाओ एक दिन
बर्फ़ सम्बन्धों की पिघलेगी ज़रूर
धूप जैसे मुस्कराओ एक दिन
घर के सन्नाटे में गुम हो जाओगे
दौड़ती सड़कों पे आओ एक दिन
Friday, November 6, 2009
चाहता हूं मगर
चाहता हूं मगर नहीं लगता
मेरा घर मेरा घर नहीं लगता
जिसके साये में दो घड़ी दम लूं
ऐसा कोई शजर नहीं लगता
अजनबी लोग, अजनबी चेहरे
ये शहर वो शहर नहीं लगता
ये महावर,ये मेंहदियां, ये पाँव
तू मेरा हमसफ़र नहीं लगता
ये धमाके तो रोज़ होते हैं
अब परिन्दों को डर नहीं लगता
दिल को लगते हैं लोग अच्छे भी
पर कोई उम्र भर नहीं लगता
तेरी चारागरी में उम्र कटी
आज तक तो असर नहीं लगता
आइने में भी अजनबी है कोई
ये मुझे वो अमर नहीं लगता