Monday, April 30, 2012

दर्द आँखों में नहीं 

दर्द आँखों में नहीं दिल में दबाए रखना
इस ख़ज़ाने को ज़माने से छुपाए रखना

हमने बोये हैं अंधेरों में सदा धूप के बीज
हमको आता है उमीदों को जगाए रखना

आज के ख़त ये कबूतर ही तो पहुंचाएंगे कल
इन परिंदों को धमाकों से बचाए रखना 

सारे रिश्तों की हक़ीक़त न परखने लगना
कुछ भरम जीने की ख़ातिर भी बचाए रखना

उसके आने का भरोसा तो नहीं फिर भी नदीम
इक दिया आस का देहरी पे जलाए रखना 


Monday, August 8, 2011

किसे अजनबी कहें

किसे अजनबी कहें किसे अनजाना मन
जब हर शख्स लगे जाना-पहचाना  मन

पता   पूछते   हैं   भोले  बस्ती   वाले
बंजारों का कैसा  ठौर-ठिकाना    मन   

सुख आया दो पल ठहरा फिर लौट गया  
दुःख ने ही सीखा है साथ निभाना   मन

जिस मूरत को छुआ वही पत्थर निकली
धीरे-धीरे   टूटा   भरम   पुराना   मन

यहां ठहरना अपने बस की बात कहां
लगा रहेगा यूं ही आना-जाना    मन 

सन्नाटों में उम्र बिताई है फिर भी
सन्नाटों के आदी मत  हो जाना मन

मंजिल एक छलावा ही तो है तुम तो
चलते-चलते राहों में खो जाना  मन

Saturday, January 15, 2011

कितने दिन

कितने दिन दुस्वप्न सरीखे लौट-लौट कर आओगे
ओ अभिशप्त अतीत भला कब वर्तमान से जाओगे

तिरस्कार और उपहासों से हमको तो चुप कर दोगे 
पर अपने मन की सोचो उसको कैसे बहलाओगे   

पार उतर कर तुमने अपनी नाव जला तो डाली है
कभी लौटना पड़ा अगर तो सोचो कैसे आओगे

बूढ़ी आँखें रास्ता तकते-तकते पथरा जायेंगी
तुम भी लौटेगे ज़रूर पर उस दिन इन्हें न पाओगे

इन शरीफ़ लोगों की बस्ती से नदीम प्रस्थान करो
यहां अगर ठहरे तो तुम भी इन जैसे हो जाओगे 

Tuesday, January 4, 2011

जीवन में

जीवन में संबंधों का कुछ अजब विरोधाभास रहा
हर घनिष्ठता में शामिल एक दूरी का एहसास रहा 

कोई पुराना प्यारा चेहरा, कोई पुरानी याद न थी
बचपन की गलियों में जाकर भी मन बहुत उदास रहा

जनम-जनम का अपना नाता, हम-तुम कभी न बिछड़ेंगे
तुम भी यूं ही कहते थे, हमको भी कब विश्वास रहा 

रामकथा का सार न बदला वाल्मीकि से तुलसी तक
राम रहे राजा, सीता के हिस्से में बनवास रहा 

धनी प्रवासी पुत्र सरीखा सुख जीवन भर दूर रहा
दुःख अनपढ़ बेरोज़गार बेटे सा अपने पास रहा 

Friday, November 26, 2010

दर्द पर

दर्द पर अंकुश लगाना है कठिन
इन दिनों हंसना-हंसाना है कठिन

दूर रहने में कोई उलझन न थी
पास आकर दूर जाना है कठिन

आंख में आकाश के सपने लिये
उम्र पिंजरे में बिताना है कठिन

सीप तो सन्तुष्ट है एक बूंद से
प्यास सागर की बुझाना है कठिन

दुश्मनों की क्या कहें इस दौर में
दोस्तों से पार पाना है कठिन

दिल किसी बच्चे सा ज़िद्दी है नदीम
रूठ जाये तो मनाना है कठिन 

Saturday, October 23, 2010

कौन

रात की रानी से भीगी सी हवा लाया है कौन
चल के देखो तो तुम्हारे द्वार पर आया है कौन

गीत हों मधुमास के, या पतझरों की बात हो
देखना होगा खिला है कौन, मुरझाया है कौन

किसका पेशा बन गया था बेचना सूरज के स्वप्न
सुबह की पहली किरन झरते ही घबराया है कौन

छेड़िये चर्चा कभी संघर्ष की, बलिदान की
ग़ौर से फिर देखिये, चर्चा से कतराया है कौन

तोड़ दी थी डोर किसने एक ही पल में नदीम
और उसके बाद सारी उम्र पछताया है कौन

Monday, September 6, 2010

जीवन भर

जीवन भर पछताए कौन 
ऐसी लगन लगाए कौन


बैद  नहीं उपचार नहीं
फिर ये रोग लगाए कौन 


तू आयेगा - झूठी बात 
पर मन को समझाए कौन


उस नगरी में सारे सुख
उस नगरी में जाए कौन


मन ही मन का बैरी है 
और भला भरमाये कौन