Friday, August 22, 2008

सुबह-सवेरे

सुबह-सवेरे सिला बीनने जाती है रज्जो की अम्मा;
किलो-दो किलो नाज रोज़ ले आती है रज्जो की अम्मा।

उसमें से भी थोड़ा सा लाला जी की दुकान पर दे कर,
नमक, तेल, आलू, थोड़ा गुड़ लाती है रज्जो की अम्मा।

रज्जो हुई सयानी, कैसे पार लगेगी, सोच-सोच कर,
रात-रात भर जगती ही रह जाती है रज्जो की अम्मा।

अगले साल पेंशन बँधवा देंगे, कहते हैं प्रधान जी;
उनके घर भी न्यार-फूस कर आती है रज्जो की अम्मा।

रज्जो के बाबू थे, बुग्गी थी, तब कितना सुख था; अक्सर,
बीते कल की यादों में खो जाती है रज्जो की अम्मा।

Tuesday, August 19, 2008

माना कड़ी धूप है

माना कड़ी धूप है फिर भी, मन ऐसा घबराया क्या?
सूखे हुए बबूलों से ही, चले मांगने छाया क्या?

सुना है उनके घर पर कोई साहित्यिक आयोजन है;
हम तो जाहिल ठहरे लेकिन, तुम्हें निमंत्रण आया क्या?

बच्चा एक तुम्हारे घर भी कचरा लेने आता है;
कभी किसी दिन, उसके सर पर, तुमने हाथ फिराया क्या?

बिटिया है बीमार गाँव में, लिक्खा है-घर आ जाओ;
कैसे जायें! घर जाने में, लगता नहीं किराया क्या?

ऐसे गुमसुम क्यों बैठे हो! आओ, हमसे बात करो।
यहाँ सभी तुम जैसे ही हैं; अपना कौन, पराया क्या?

Monday, August 18, 2008

इक तरफ़ तो

इक तरफ़ तो दूर कश्ती से किनारा है बहुत;
नाख़ुदाओं का भी तूफ़ाँ को इशारा है बहुत।

प्यास बुझने की तुम्हें उम्मीद जिस सागर से है,
कितनी नदियां पी चुका है;फिर भी खारा है बहुत।

बादबानी कश्तियाँ खायें हवाओं का फ़रेब;
हमको अपने बाज़ुओं का ही सहारा है बहुत।

ख़ुद को वो समझे थे लेनिन और फ़रमाया किये,
चेतना-वंचित यहां का सर्वहारा है बहुत।

भीड़ में तो ख़ैर निष्ठुरता का अभिनय ही रहा;
सच कहूं! एकांत में, तुमको पुकारा है बहुत।

Saturday, August 16, 2008

फूल किसी जंगल का

फूल किसी जंगल का आँसू;
क़तरा है बादल का आँसू।

सदियों की सूखी आँखों से,
आज अचानक छलका आँसू।

मुस्कानों के सारे परदों
के पीछे से झलका आँसू।

बेमन से घर छोड़ा शायद;
थमा रहा, फिर ढलका आँसू।

रुका-रुका सा खोज रहा है-
छोर किसी आँचल का आँसू।

Thursday, August 14, 2008

रवाँ हों अश्क

रवाँ हों अश्क, लबों पर हँसी नज़र आये;
चिता की लौ में नई ज़िन्दगी नज़र आये।

धुएं से यूं न डर ए दोस्त! बहुत मुमकिन है,
धुएं के पार कोई रौशनी नज़र आये।

क़दम-क़दम पे फ़रिश्तों की भीड़ मिलती है;
कभी, कहीं तो कोई आदमी नज़र आये।

समदरों ने भला किसकी प्यास को सींचा!
उन्हें कहाँ से मेरी तश्नगी नज़र आये।

ये काला चश्मा ही परदा मेरे वजूद का है;
हटे तो सबको मेरी बेक़सी नज़र आये।

Wednesday, August 13, 2008

कभी हिंदुत्व

कभी हिंदुत्व पर संकट, कभी इस्लाम ख़तरे में;
ये लगता है कि जैसे हैं सभी अक़वाम ख़तरे में।

उधर फ़तवा कि खेले सानिया सलवार में टेनिस;
ज़मीनों के लिये हैं, इस तरफ़ श्री राम ख़तरे मे।

दहाड़े रात भर माइक पे, देवी-जागरण वाले;
मुहल्ले भर के गोया नींद और आराम ख़तरे में।

ये 'ग्लोबल कारपोरेटों' का हमला है,पड़ेगा ही-
मुहब्बत का, वफ़ा का, दोस्ती का नाम ख़तरे में।

पुजेंगे गोडसे और गोलवरकर, फिर तो आयेगा
कबीर ओ गौतम ओ नानक का हर पैग़ाम खतरे में।

Monday, August 11, 2008

कहां गए

कहां गए वो लड़कपन के ख़्वाब, मत पूछो;
कड़ा सवाल है, इसका जवाब मत पूछो।

अकेले मेरे दुखों की कहानियां छोड़ो;
समंदरों में लहर का हिसाब मत पूछो।

मुबारकों की रवायत है कामयाबी पर,
कि कौन कैसे हुआ कामयाब, मत पूछो।

जो हर कदम पे मेरे साथ है, वो तनहाई
मेरा नसीब है या इंतख़ाब, मत पूछो।

अमावसों में चराग़ों का इंतज़ाम करो;
कहां फ़रार हुआ आफ़ताब मत पूछो।