Friday, November 6, 2009

चाहता हूं मगर

चाहता हूं मगर नहीं लगता

मेरा घर मेरा घर नहीं लगता

 

जिसके साये में दो घड़ी दम लूं

ऐसा कोई शजर नहीं लगता

 

अजनबी लोग, अजनबी चेहरे

ये शहर वो शहर नहीं लगता

 

ये महावर,ये मेंहदियां, ये पाँव

तू मेरा हमसफ़र नहीं लगता

 

ये धमाके तो रोज़ होते हैं

अब परिन्दों को डर नहीं लगता

 

दिल को लगते हैं लोग अच्छे भी

पर कोई उम्र भर नहीं लगता

 

तेरी चारागरी में उम्र कटी

आज तक तो असर नहीं लगता

 

आइने में भी अजनबी है कोई

ये मुझे वो अमर नहीं लगता

 

8 comments:

  1. ये मुझे वो अमर नहीं लगता ...
    मुझे तो ऐसा नहीं लगता भाई जी !

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  2. अमर जी आज आपने कमाल लिखा है! एक एक शेर नायाब मोती की तरह है.
    "ये धमाके . . . " मुझे बहुत ही अच्छा लगा
    और "दिल को . . ." तो बस जान ले गया! ये कोहीनूर है !
    "ये महावर . . ." क्या unique शेर है, ऐसा कुछ कहीं आज तक नहीं पढ़ा!
    और इस दफा ग़ज़ल भी लम्बी है दादा, शेर लगता है एक साथ उमड़ के बादलों की तरह आये हैं आपके जेहन में, तभी इतनी खूबसूरती से बरसे हैं कागज़ पे !
    मन खुश कर दिया आज आपने!
    सादर . . . :)

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  3. आइने में भी अजनबी है कोई

    ये मुझे वो अमर नहीं लगता
    बहुत सुंदर रचना अमर जी, भी शेर बहुत सुंदर
    धन्यवाद

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  4. दिल को लगते हैं लोग अच्छे भी
    पर कोई उम्र भर नहीं लगता।
    आइने में है ...
    अच्छे शेर हैं अमर जी
    साधु!

    सादर

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  5. pahali baar aayaa hu aapke blog par..aour lagaa ki pahle aapkaa blog khangaalnaa hogaa kyoki ynhaa mujhe bahut si behatreen rachnaaye padhhne ko mil rahi he...so aataa hu ..pahle padhh lu.

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  6. Amar jee,
    want one more ghazal from you before we ring out 2009.

    Regards,
    The daily puppy fan :)
    you know who :) :)

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