Saturday, October 23, 2010

कौन

रात की रानी से भीगी सी हवा लाया है कौन
चल के देखो तो तुम्हारे द्वार पर आया है कौन

गीत हों मधुमास के, या पतझरों की बात हो
देखना होगा खिला है कौन, मुरझाया है कौन

किसका पेशा बन गया था बेचना सूरज के स्वप्न
सुबह की पहली किरन झरते ही घबराया है कौन

छेड़िये चर्चा कभी संघर्ष की, बलिदान की
ग़ौर से फिर देखिये, चर्चा से कतराया है कौन

तोड़ दी थी डोर किसने एक ही पल में नदीम
और उसके बाद सारी उम्र पछताया है कौन

3 comments:

  1. "छेडिये चर्चा कभी संघर्ष की ....." बहुत सुन्दर रचना.

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  2. किस का पेशा बन गया----
    छोडिये चर्चा कभी-----
    लाजवाब शेर हैं। गज़ल बहुत अच्छी लगी बधाई।

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  3. बहुत सुंदर कविता.

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