Monday, July 23, 2012

उनकी महफ़िल है

उनकी महफ़िल है फ़क़त हंसने हंसाने के लिये
कौन जाये दर्द की गाथा सुनाने के लिये

जेब में मुस्कान रख कर घूमता है आदमी
जब जहां जैसी ज़रूरत हो दिखाने के लिये

ले गये कमज़र्फ हंस हंस कर वफ़ाओं की सनद
हम सरीखे ही बचे हैं आज़माने के लिये

गाँव में क्या था कि रुकते खेत घर सब बिक चुके
अब भटकते हैं शहर में आब-ओ-दाने के लिये

आज फिर राजा को नंगा कह गया सरकश कोई
फिर से हैं तैयारियां मकतल सजाने के लिये  

2 comments:

  1. बहुत ही खूबसूरत, पैनी ग़ज़ल!
    जेब में मुस्कान रख कर घूमता है आदमी...-- >याद हो जाने वाला मिसरा! बहुत खूब!
    जब जहाँ जैसी ज़रुरत हो दिखाने के लिए ...--> बेहद तीखा. इसमें एक बढ़िया बात-- जो इसे 'मुस्कराहट से ग़म छुपाने ' वाले अशआर से अलग करता है ...वह यह कि यहाँ 'जब जहाँ जैसी ज़रुरत' ... में बड़ा तंज है!
    हम सरीखे ही बचे हैं आजमाने के लिए... :) वाह वाह --> थोड़ी हंसी, थोड़ा deja vu से भरा शेर है ये!
    मक्ता आपका हस्ताक्षर है इस ग़ज़ल में! गज़ब! सरकश कितना सुन्दर बैठ रहा है शेर में. क्या बात है...क्या मिजाज़ हैं शेर के! आज बाज़ार में पा-ब-जौला चलो...की याद आ गई!
    पूरी ग़ज़ल खूबसूरत है! दर्द सुनाने और आबोदाने वाला शेर भी बेहतरीन!
    यूँ ही लिखते रहें! सादर शार्दुला

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