Saturday, October 3, 2009

सभी से

दुखों से दोस्ताना हो गया है
तुम्हें देखे ज़माना हो गया है

खिलौनों के लिये रोता नहीं है
मेरा बेटा सयाना हो गया है

भरी महफ़िल में सच कहने लगा है
इसे रोको- दिवाना हो गया है

मुखौटा इक नया ला दो कहीं से
मेरा चेहरा पुराना हो गया है

कभी संकेत में कुछ कह दिया था
उसी का अब फ़साना हो गया है


9 comments:

  1. वाह ! बहुत बढ़िया.

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  2. अतिसुन्दर ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई.

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  3. बहुत खूबसूरत ग़ज़ल. बेहतरीन

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  4. खिलौनों के लिये रोता नहीं है
    मेरा बेटा सयाना हो गया है

    बहुत सुंदर भाव लिये है आप की यह गजल.बेटे को बाप की मजबुरी समझ आ गई होगी.
    धन्यवाद

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  5. "कभी संकेत में कुछ कह दिया था". यही तो समस्या की जड़ है. बहुत सुन्दर रचना. आभार

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  6. बहुत खूब भाई जी, शुभकामनायें !

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  7. khilauno ke liye rotaa nahi hai
    mera beta siyaana ho gayaa hai

    waah....
    bahut hu khoobsurat aur pukhtaa
    khayaal se ru-b-ru karvaya aapne
    ghazal bahut achhee kahi hai

    ---MUFLIS---

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  8. डाक्टर साहब,
    काफी देर से सोच रही हूँ कि क्या बेहतर था : उदासी का बहाना हो गया है या सभी से दोस्ताना हो गया है . . . और अब मुझे सभी से दोस्ताना ... वाला अच्छा लगने लगा है ये टिप्पणी लिखते समय... ऐसा महसूस हो रहा है कि वह space fill करने के लिए सभी से दोस्ताना करना लाज़मी हो गया पर फ़िर भी कसर रह गयी. क्या कहते हैं आप?
    उसी एहसास का शेर ये भी है. . . उसी का अब . . . बहुत खूब!
    बच्चा सयाना . . , रोको दीवाना . . . इस तरह के शेर कहने में आपको महारत है, कितने कम अल्फाज़ में क्या कह जाते हैं आप!! वल्लाह!
    मुखौटा ला दो . . . ये फ़िर से आपने introspection करने के लिए मजबूर किया :( ये काम भी आपकी साईट पे करना पड़ता है . . . क्या मजबूरी है डाक्टर :)
    ---
    अरे हाँ, विशु को The daily puppy दिखाना पड़ता है, फ़िर वह आपकी ग़ज़ल पढने देती है :) :)

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  9. नहीं कह पाये हम अशाआर ऐसे
    गज़ल लिखते ज़माना हो गया है

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