Sunday, September 7, 2008

बदली के छाने से

बदली के छाने से, मोरों के गाने से;

दहशत सी होती है, सावन के आने से।


गोबर भी बीनें तो सूखा कब मिलता है,

आँखें ही जलती हैं चूल्हा सुलगाने से।


खेतों में काम नहीं, घर में भी दाम नहीं,

शायद कुछ बात बने,शहर भाग जाने से।


सारे फुटपाथों पर पानी भर जाता है;

रात भर भटकते हैं बिस्तर छिन जाने से।


गावों से, शहरों से, घर से फ़ुटपाथों से,

हम तो निष्कासित हैं हर किसी ठिकाने से।

11 comments:

  1. बहुत गजब!! बेहतरीन!!


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    निवेदन

    आप लिखते हैं, अपने ब्लॉग पर छापते हैं. आप चाहते हैं लोग आपको पढ़ें और आपको बतायें कि उनकी प्रतिक्रिया क्या है.

    ऐसा ही सब चाहते हैं.

    कृप्या दूसरों को पढ़ने और टिप्पणी कर अपनी प्रतिक्रिया देने में संकोच न करें.

    हिन्दी चिट्ठाकारी को सुदृण बनाने एवं उसके प्रसार-प्रचार के लिए यह कदम अति महत्वपूर्ण है, इसमें अपना भरसक योगदान करें.

    -समीर लाल
    -उड़न तश्तरी

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  2. बहुत खूबसुरत अन्दाजे बयां .

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  3. एक दिन में ही इतनी पोस्ट वाह भी क्या बात है

    सुंदर रचना
    वीनस केसरी

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  4. पहली बार आपके ब्लाग पर आया। अच्छा लिखा आपने।

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  5. कोई नही सोचता इनके बारे में ! अमर भाई !

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  6. बहुत दिनों बाद नेट पर बेहतरीन हिंदी गजल पढ़ी। सच कहा है कि दहशत सी होती है सावन के आने से। आपकी गजल को रस्मअदायगी के लिए किसी टिप्पढ़ीं की जरूरत नहीं है।

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  7. गोबर भी बीनें तो सूखा कब मिलता है,
    आँखें ही जलती हैं चूल्हा सुलगाने से।
    खेतों में काम नहीं, घर में भी दाम नहीं,
    शायद कुछ बात बने,शहर भाग जाने से।

    सीधे दिल में उतर गये.......सीधे .....

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  8. अलग मिजाज़ साफ़ झलक
    रहा है...सावन के आने पर
    दहशत की बात, न जाने कितनी
    ज़िंदगियों के सूखे सावन की कहानी
    कह रही है.... सच के पक्ष में अडिग
    खड़ी है आपकी यह प्रस्तुति....बधाई.
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