Saturday, September 13, 2008

साँझ ढले

सांझ ढले,
बात चले।

भूख लगे,
देह जले।

हाकिम को
सत्य खले।

झूठ कहो;
दाल गले।

पहचाना!
कौन छले?

9 comments:

  1. बहुत अनूठी रचना और अच्छी भी।

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  2. पहचाना!
    कौन छले?
    Wonderful, totally different style.

    Regards

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  3. बिल्कुल ठीक कहा.
    झूठ कहने वालों की दाल
    ग़लती है...और सच कहने वालों का
    दिल जलता है !.....अत्यल्प शब्दों में
    यह ग़ज़ल जैसी रचना अच्छी लगी.
    ============================
    डॉ.चन्द्रकुमार जैन

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  4. भूख लगे,
    देह जले।

    हाकिम को
    सत्य खले।

    बहुत खूब......

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  5. शब्दों की ये किफायत ! काबिले तारीफ !

    जो कहें,
    सही लगे !

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