Tuesday, July 29, 2008

मानिये मत

मानिये मत यूं धुएं से हार बंधु;
देखिये! है रौशनी उस पार बंधु।

रक्त का झरना बहा सर से तो क्या,
ज़ुल्म की भी हिल चली दीवार बंधु।

सुख की घड़ियां उंगलियों पर गिन चुके,
कैसे नापें दुख का पारावार बंधु।

तुम तो हो शम्बूक ख़ुद ही सोच लो,
तुमको क्या देगा कोई अवतार बंधु।

मेरे स्वप्नों पर हँसो मत; देखना,
स्वप्न ये होंगे सभी साकार बंधु।





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