Thursday, July 31, 2008

घने बनों में

घने बनों में शहर का पता कहीं न मिला;
भरी थी नाव, मगर नाख़ुदा कहीं न मिला।

लिखी थी किसने ये उलझी सी ज़िन्दगी की ग़ज़ल!
कोई रदीफ़, कोई काफ़िया कहीं न मिला।

महँत बैठे थे काबिज़ सभी शिवालों में;
बहुत पुकारा मगर देवता कहीं न मिला।

सुना तो था कि इसी राह से वो गुज़रे थे,
तलाश करते रहे; नक्श-ए-पा कहीं न मिला।

सफ़र हयात का तनहा ही काट आये नदीम;
लगे जो अपना सा वो काफ़िला कहीं न मिला।

4 comments:

  1. "महँत बैठे थे काबिज़ सभी शिवालों में;
    बहुत पुकारा मगर देवता कहीं न मिला।"

    बहुत सुंदर यथार्थ वर्णन !!

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